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1st Rajab, 1433 | Thursday, May 24, 2012
City News

तारीख़ी कमानें तज़ईन-ए-नौ से महरूम

Monday, 20 February 2012
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नुमाइंदा खूसूसी- हैदराबाद एक ऐसा शहर है जिसे हम बीला मुबालग़ा हिंदूस्तान में तहज़ीब-ओ-तमद्दुन और आसारे-ए-क़दीमा का मर्कज़ भी कह सकते हैं। इस तारीख़ी शहर के दामन और अतराफ़-ओ-अकनाफ़ में आज भी सैंकड़ों इमारतें ऐसी हैं जो मुल्की-ओ-ग़ैर मुल्की सय्याहों को अपनी जानिब राग़िब कर लेती हैं। जहां हमारे शहर के दरमियानी हिस्सा में चारमीनार अपने वुजूद के ज़रीया दुनिया को हैदराबादी तारीख़ की अज़मत, शान-ओ-शौकत का एहसास दिला रहा है, वहीं ये भी बता रहा है कि मैं और मेरे अतराफ़ फैली हुई फ़न तामीर का शाहकार तारीख़ी इमारतें हिंदूस्तान के वक़ार-ओ-अज़मत की रोशन मिसालें हैं।

लेकिन अफ़सोस तो इस बात पर होता है कि आज रियास्ती हुकूमत से लेकर आरक्यालोजीकल सर्वे आफ़ इंडिया और महकमा सेयाहत तक इन इमारतों के तईं ग़फ़लत बरत रहे हैं। जिस की वजह समझ में नहीं आती। दक्कन की तहज़ीब की याद दिलाने वाली कई इमारतें आज अपना वुजूद खो चुकी हैं। जबकि जो मौजूद हैं उन की ख़सता हाली को देख कर हर मुहिब-ए-वतन शहरी फ़िक्र में मुबतला होजाता है। ऐसी ही इमारतों और कमानों में चारमीनार के क़रीब मौजूद चार तारीख़ी कमानें भी हैं जो सरे दसत हुकूमत, महकमा सेयाहत और महकमा आसारे-ए-क़दीमा के साथ साथ अज़ीम तर मजलिस बलदिया हैदराबाद के नाअहल ओहदेदारों की ग़फ़लत का शिकार बनी हुई हैं।

इन कमानों पर जहां बड़े बड़े दरख़्त उग आए हैं वहीं जगह जगह से गच्ची गिर रही है। जिस के नतीजा में इन की बोसीदगी में दिन बदिन इज़ाफ़ा होता जा रहा है। हद तो ये है कि इन कमानों की मुरम्मत-ओ-तज़ईन-ए-नौ के लिए हुकूमत 47,56,147 रुपये का बजट भी मंज़ूर कर चुकी है लेकिन आज तक इस ज़िमन में किसी किस्म के काम का आग़ाज़ नहीं किया गया। महकमा सेयाहत के ज़राए के मुताबिक़ चार कमान, कमान सहरे बातिल और काली कमान की तज़ईन-ए-नौ का बीड़ा उठाते हुए मार्च 2010 में हुकूमत की जानिब से बिल तर्तीब 18 लाख 47 हज़ार 138 रुपये, 25,39,798 रुपये और 3,69,211 रुपये मंज़ूर किए गए थे और ऐलान किया गया था कि तज़ईन-ए-नौ का काम अप्रैल में शुरू करदिया जाएगा।

बताया जाता है कि हुकूमत के महकमा सेयाहत ने जो इन कमानों की मुरम्मत-ओ-तज़ईन-ए-नौ के लिए जुमला 47,56,147 रुपये का तख़मीना लगाया है। इस ज़िमन में माहिरीन से मुशावरत भी की है लेकिन इन वजूहात का पता ना चल सका। जिस के बाइस काम अब तक शुरू नहीं किया जा सका।

यहां पर बताना ज़रूरी होगा कि मछली कमान की हालत इंतिहाई ख़स्ता होगई,इस तारीख़ी कमान पर कई दरख़्त उग आए हैं जिस से इमारत को शदीद नुक़्सान पहुंचने का ख़दशा पैदा होगया है। दिलचस्पी और हैरत की बात ये है कि इन तमाम कमानों को तारीख़ी आसार क़रार दिया गया है। इन चारों कमानों में कमान सहरे बातिल इंतिहाई ख़राब हालत में है। अज़ीम तर मजलिस बलदिया हैदराबाद के बद उनवान ओहदेदारों की चशमपोशी और मिली भगत से एक साहब ने तो इस कमान के एक हिस्सा को अपने घर में शामिल करलिया है। ब अलफ़ाज़ दीगर वो कमान के एक हिस्सा को अपनी क़ियामगाह के तौर पर इस्तिमाल कररहे हैं।

इस पर किसी भी सरकारी महकमा को एतराज़ है और ना ही इन रज़ाकाराना तंज़ीमों को कुछ परवाह है जो तारीख़ी आसार की हिफ़ाज़त के बलंद बाँग दावे करते नहीं थकते। जबकि बलदिया के ओहदेदारों की आदत-ओ-फ़ित्रत के बारे में अवाम को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं। जहां तक इन कमानों के तारीख़ी पस-ए-मंज़र का सवाल है तो यहां इस बात का ज़िक्र ज़रूरी होगा कि चारमीनार जैसी ख़ूबसूरत अज़ीमुश्शान इमारत की शान-ओ-शौकत में मज़ीद इज़ाफ़ा करने के लिए सुलतान मुहम्मद क़ुली क़ुतुब शाह ने 1592 में ही ये चार कमानें तामीर करवाई थीं। इन कमानों में सब से ज़्यादा अहमीयत बानी शहर हैदराबाद मुहम्मद क़ुली क़ुतुब शाह ने मग़रिबी कमान, कमान सहरे बातिल को दी थी क्योंकि इस कमान में मुकम्मल तौर पर संदल की लक्कड़ी से बनाया गया एक इंतिहाई ख़ूबसूरत दरवाज़ा नसब किया गया था जिस से गुज़र कर क़ुतुब शाही महलात की जानिब आगे बढ़ा जा सकता था।

इस दरवाज़ा पर इंतिहाई ख़ूबसूरत नक़्श-ओ-निगार बनाए गए थे जबकि इसी कमान के सामने नसब करदा पत्थर के सुतून पर हज़रत मीर मोमिन ने तिलसमी तावीज़ कुंदा करवाए थे। कहते हैं कि इस सुतून में हर किस्म के जादू को ज़ाइल करने की तासीर थी। इस सतून के बाइस इस कमान का नाम कमान सहरे बातिल पड़ गया था। हज़रत मीर मोमन का मक़सद ये था कि कोई शख़्स बुरी नीयत-ओ-इरादा के साथ अगर बादशाह के पास जाना चाहे तो इस के बातिल असरात ज़ाइल होजाएं और बादशाह नुक़्सान से महफ़ूज़ रहे। तारीख़ी कुतुब में बताया गया है कि चारों कमानों की बुलंदी 50 फुट है।

आसिफ़ जाहि हुकमरानों ने भी उन पर ख़ुसूसी तवज्जा मर्कूज़ की। नवाब अफ़ज़ल दौला के दौर में चारों कमानों की दाग़ दोज़ी की गई थी। जहां तक उन के तर्ज़ तामीर का सवाल है ये ख़ालिस इस्लामी तर्ज़ पर तामीर की गई थीं। ऊपर जाने के लिए दोनों जानिब अंदर से सीढ़ीयां बनाई गईं जबकि मर्कज़ी कमान के दोनों जानिब तीन तीन छोटी कमानें बनाई गईं। बहरहाल हमें अपने माज़ी पर फ़ख़र करने के बजाय हाल का ख़्याल रखते हुए मुस्तक़बिल पर नज़र रखनी चाहीए। यहां ज़रूरत इस बात की है कि हुकूमत फ़ौरी इन कमानों की तज़ईन-ए-नौ का काम शुरू कराए। सिर्फ बजट का ऐलान करने से कुछ नहीं होगा। बल्कि अमली तौर पर इक़दामात से ही तज़ईन-ए-नौ हो सकती है।

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