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1st Rajab, 1433 | Thursday, May 24, 2012
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पुलिस हरासानी

Wednesday, 22 February 2012
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पुलिस की मुबय्यना हरासानी से पुराने शहर में एक नौजवान की ख़ुदकुशी ने झूटे केसों में माख़ूज़ करके बेक़सूर मुस्लिम नौजवानों को दी जाने वाली अज़ीयतों के तक़्लीफ़देह अफ़सोसनाक वाक़ियात का एक ख़ौफ़नाक चेहरा आशकार कर दिया है। पुलिस पर इल्ज़ाम है कि वो मुस्लिम नौजवानों को अज़ीयत दे कर उनकी ज़िंदगीयों को अजीर्ण बना रही है।

पुराने शहर में अवाम के साथ पुलिस का रवैय्या मुजरिमों की तरह होता है। पुलिस हरासानी से तंग आकर ख़ुदकुशी कर लेने वाले 25 साला नौजवान मुहम्मद अक़ील के ख़िलाफ़ रूडी शीट खोलने और इसको पुलिस स्टेशन तलबी के ज़रीया ज़हनी-ओ-जिस्मानी अज़ीयत दी जा रही थी।

पुलिस की तफ्तीश का तरीक़ा इंसानी हुक़ूक़ के मुग़ाइर हो जाए तो ये मुआमला अज़ ख़ुद एक जुर्म की तारीफ़ में आता है। शहर में अमन-ओ-ज़बत की बरक़रारी और गुंडा अनासिर की सरकूबी पुलिस महकमा की ज़िम्मेदारी है इसको हासिल इख़्तेयारात के तईं वो पाबंद है कि वो शहरीयों के हुक़ूक़ का तहफ़्फ़ुज़ करे और अमन-ओ-अमान की बरक़रारी को यक़ीनी बनाए।

महकमा पुलिस की कारकर्दगी बिलाशुबा मुआशरा में नज़म-ओ-ज़बत की बरक़रारी के लिए अहम होती है मगर बाअज़ किरदार ऐसे होते हैं जो पुलिस के इख़्तेयारात का बेजा इस्तेमाल करके बेक़सूर शहरीयों को हरासाँ करते हैं। मुहम्मद अक़ील का केस भी ऐसा ही है। इस नौजवान के साथ होने वाली ज़्यादती का किसी ने नोट नहीं लिया।

नौजवान ने अपनी ख़ुदकुशी नोट में जिस बेचैनी और करब का इज़हार किया है वो उसकी हर गुज़रते दिन की तकलीफ़ का सबूत है। ख़ुदकुशी नोट की असास पर ही ख़ाती पुलिस मुलाज़मीन और इसकी वजह बनने वाले अफ़राद के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानूनी कार्रवाई की जानी चाहीए।

पुलिस अवाम की मुहाफ़िज़ होती है उनके मौत की सौदागर नहीं मगर पुलिस के बाअज़ ख़ुदग़र्ज़ और मुख़्बिरी का पेशा करने वालों ने ज़ाती फ़ायदे के लिए इस महिकमा की कारकर्दगी को मुश्तबा बना दिया है। नौजवानों के साथ रवा सुलूक और पुराने शहर में मुखबिरों की जानिब से ज़ाती मुख़ास्मत निकालने या रिश्वत की ख़ातिर सादा लौह नौजवानों को निशाना बनाने के वाक़ियात का सख़्त नोट लेना ज़रूरी हो गया है।

हुकूमत और महकमा दाख़िला की ये अव्वलीन ज़िम्मेदारी है कि वो पुलिस स्टेशनों के तहत काम करने वाले बाअज़ बद उनवान और ग़ैर ज़िम्मेदार मुलाज़मीन का नोट लें। पुलिस कार्रवाई को शफ़्फ़ाफ़ और इन्साफ़ रसानी का ज़रीया बनाने के बजाय उसे रुपया बटोरने नाहक़ किसी को सज़ा देने का हथियार बना लिया जाए तो पुराने शहर बल्कि किसी भी इलाक़ा में बेक़सूर अफ़राद यूं ही अज़ीयत का शिकार होते रहेंगे।

पुराने शहर में ग़रीब अवाम की अक्सरीयत सयासी टोलों और उनके ग़ुंडों, सूदखोरों के तहत काम करने वालों की ज़्यादतियों का शिकार हैं। इसमें पुलिस स्टेशन से वाबस्ता चंद मुलाज़मीन भी शामिल हैं जो लोगों को हरासाँ करके रुपया बटोरते हैं। किसी भी हीले बहाने से अवाम को तंग करने के वाक़ियात का आला सतह पर बरवक़्त नोट लिया जाए तो मुहम्मद अक़ील की तरह ख़ुदकुशी का दर्दनाक-ओ-पुलिस अज़ीयत का होलनाक अंजाम नहीं होगा।

मुस्लिम मुआशरा में ख़ुदकुशी का रुजहान मायूब बात है इस ग़ैर इस्लामी इक़दाम को रोकने के लिए मुस्लमानों में बेदारी ज़रूरी है। हालात का मुक़ाबला करना और जान की हिफ़ाज़त करते हुए मसाइल से निमटने की कोशिश करने से दुश्मन ताक़तों को नाकामी होगी। ख़ुदकुशी के इंतिहाई इक़दाम का मतलब यही है कि ख़ुदकुशी करने वाला इंसान बेबसी, मायूसी और उलझन का शिकार होकर नजात चाहता है।

दुनिया भर में ख़ुदकुशी के वाक़ियात होते हैं दुनिया का कोई मुल़्क ख़ुदकुशी करने वालों से पाक नहीं है। लेकिन हमारे मुल्क में ख़ुदकुशी की वजूहात मआश और हालात के इलावा अज़ीयत नाक वाक़ियात से मरबूत होते हैं। लोग भूख, इफ़लास, ग़ुर्बत, बीमारी में हो दक्षी करते हैं। मगर पुलिस की अज़ीयत भी इन ग़रीबों के लिए ख़ुदकुशी का मूजिब बन रही है।

पुराने शहर तालाब कट्टा, नशेमन नगर के मुहम्मद अक़ील ने पुलिस तशद्दुद के बाइस ख़ुदकुशी कर ली। इसने अपने मकान में फांसी ले ली बाअज़ नौजवान हवालात में ही मौत को गले लगा लेते हैं। पुलिस हरासानी के वाक़ियात में इज़ाफ़ा होने के बावजूद हुकूमत और महकमा के आला ओहदेदार इसके तदारुक के लिए इक़दामात नहीं करते।

पुलिस की सोच अगर अज़ीयत को ही अपनी कामयाबी मानती है तो इंसानी हुक़ूक़ के अलंबरदारों को इस सोच के ख़िलाफ़ एहतिजाज बुलंद करने की ज़रूरत है। नौजवानों को पुलिस के तशद्दुद और ग़ैर इंसानी सुलूक से महफ़ूज़ रखने के इक़दामात किए जाने चाहीए।

वर्ना मुआशरा में एक बीमार माँ के बेटे मुहम्मद अक़ील की तरह अज़ीयत भरी ज़िंदगी और पुलिस हरासानी की एक लंबी मुसाफ़त तय करने के बाद कई बेक़सूर नौजवान अपने जिस्मों को नाशों में तबदील करते रहेंगे। नाम निहाद मुस्लिम क़ियादत के टोले से हमदर्दी और मेहरबानी का इंतिज़ार करते करते इस नौजवान ने मौत को गले लगा लिया।

इस नौजवान की तरह इस शहर की क़ियादत किसी पर भी मेहरबान नहीं है। इस नौजवान या इस तरह के कई बेक़सूर नौजवानों को पुलिस हरासानी के बाइस कितनी फ़िक्रें लाहक़ हैं, इसकी जामि तहक़ीक़ात कराई जानी चाहीए। शहर और दीगर मुक़ामात पर पुलिस स्टेशनों में ऐसे कई बेक़सूर मुस्लिम नौजवानों पर मुक़द्दमात और रूड़ी शीट्स खोले गए हैं उनकी जांच करवाकर ख़ाती पुलिस मुलाज़मीन को बरतरफ़ कर देना चाहीए।

मुस्लिम रज़ाकार तंज़ीमों की भी ज़िम्मेदारी है कि वो अपने अतराफ़-ओ-अकनाफ़ होने वाली पुलिस ज़्यादतियों और नाइंसाफ़ीयों का नोट लेकर मुताल्लिक़ा पुलिस स्टेशन की कारकर्दगी का जांच लें उस वक़्त हिंदूस्तान के क़वानीन इंसानी हुक़ूक़ के हक़ में हैं।

हक़ मालूमात क़ानून के तहत हर शहरी को ये इख्तेयार हासिल है कि वो सरकारी महिकमों की कारकर्दगी का तहरीरी रिकार्ड हासिल करे। पुलिस स्टेशनों में बेक़सूर मुस्लिम नौजवानों का रिकार्ड इकट्ठा करके उनकी क़ानूनी कार्यवाईयों और पुलिस की ज़्यादतियों का नोट लिया जाए तो आइन्दा कोई मुस्लिम नौजवान मुहम्मद अक़ील की तरह पुलिस और मुखबिरों की हुर्रा सानी का शिकार ना हो सके।

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