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1st Rajab, 1433 | Thursday, May 24, 2012
City News

हज़रत दाग़ के मज़ार की हिसारबंदी ज़रूरी

Thursday, 23 February 2012
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(नुमाइंदा ख़ुसूसी)शहर हैदराबाद हमेशा से ही उन अज़ीम हस्तीयों का मर्कज़ तवज्जा बना रहा जिन्हों ने अपनी क़ाबिलियतों, ख़ुदादाद सलाहीयतों और हुस्न-ओ-ब्यान के बाइस एक दुनिया को अपना दीवाना बनाए रखा। जहां तक उर्दू के इस शहर में दुनियाए उर्दू की अज़ीम हस्तीयों की आमद का सवाल है, तो हमेशा ही इस सरज़मीन ने इन शख़्सियतों को ख़ुश आमदीद कहते हुए अपने दामन में समेट लिया।

इस शहर की मुहब्बत-ओ-मुरव्वत, शाइस्तगी, तहज़ीब-ओ-तमीज़, जज़बा मेहमान नवाज़ी, ईसार-ओ-क़ुर्बानी और इंसाफ़ पसंद हुकमरानों की हौसला अफ़्ज़ाई और इलम पर्वरी और इलम नवाज़ी ने आसमान उर्दू के कई एक दरख़शिंदा सितारों को ना सिर्फ इस शहर का रुख करने पर आमादा किया बल्कि वो इस शहर से और यहां की आब-ओ-हवा से इतने मुतास्सिर हुए कि हमेशा हमेशा के लिए उसे अपना मस्कन और वतन सानी बना लिया और यहीं मरने और दफ़न होने को तर्जीह दी।

दुनियाए अदब की ऐसी ही अज़ीम, कद्दावर-ओ-बावक़ार शख़्सियतों में से एक नवाब मिर्ज़ा ख़ान दाग़ देहलवी भी थे, जिन्हों ने उर्दू अदब-ओ-शायरी को अपने बेहतरीन, असर अंगेज़, सदा आफ़रीं और क़ुलूब ज़हनों में उतर जाने वाले पाकीज़ा कलाम के ज़रीया संवारने-ओ-सजाने का एज़ाज़ हासिल किया। क़ारईन! उर्दू के इस अज़ीम शायर ने हमारे शहर हैदराबाद में ही ररहलत पाई और उन की ख़ुशनसीबी रही कि दरगाह हज़रात यूसुफ़ैन(र) के अहाता में इन की तदफ़ीन अमल में आई।

राक़िम उल-हरूफ़ को हज़रत दाग़ और उन की अहलिया के मज़ारात की हालत-ए-ज़ार देख कर बड़ा अफ़सोस हवा क्योंकि एक गुल फ़रोश ने इन मज़ारात के क़रीब ही अपनी दूकान खोल रखी है जिस से मज़ारात की बेहुर्मती हो रही है। ज़रूरत इस बात की है कि उर्दू का नाम लेने वाली तंज़ीमें और ख़ुद हुकूमत इन मज़ारातकी मौज़ूं तौर पर हिसारबंदी करे।

नीज़ दरगाह के इंतिज़ामीया से दरख़ास्त की जाती है कि मज़ारात के तहफ़्फ़ुज़ और एहतिराम को बहाल रखने की हर मुमकिन कोशिश करे ताकि क़ुबूर की बेहुर्मती ना होने पाए। क़ारईन! आप को ये बतादें कि हज़रत दाग़ ने ज़िंदगी भर अपने क़लम से उर्दू के चमन की आबयारी की, उन्हें इस बात का भी एज़ाज़ हासिल रहा कि वो एक शहीद वतन के फ़र्ज़ंद थे। 5 मई 1831 -को दिल्ली के इलाक़ा चांदनी चौक में पैदा हुए।

नवाब मिर्ज़ा ख़ान दाग़ के वालिद शमस उद्दीन ख़ान को वतन-ए-अज़ीज़ हिंदूस्तान के लिए जाम शहादत नोश करने का एज़ाज़ हासिल रहा। उन्हें विलियम फ्ऱेज़र रीज़ीडेनट दिल्ली के क़तल के इल्ज़ाम में ज़ालिम अंग्रेज़ों ने 8 अक्टूबर 1835 -ए-को बरसर-ए-आम फांसी देदी थी। यही नहीं बल्कि ज़ालिम अंग्रेज़ हुकूमत ने उन की सारी जायदाद भी ज़बतकरली थी।

दाग़ देहलवी के आबा-ए-ओ- अज्दाद चूँकि फ़न सिपागरी और आलात हर्बी के माहिर थे। इस से उन के ख़ानदानी पस-ए-मंज़र को देखते हुए उस वक़्त मिर्ज़ा मुहम्मदसुलतान वलीअहद शाह दिल्ली ने उन के ख़ानदान को पनाह दी। मासूम दाग़ जिन्हें शायरी से काफ़ी दिलचस्पी थी, उन्हें क़िला मुअल्ला में हर तरफ़ शेअर-ओ-शायरी का माहौल नसीब हवा और यहीं से उन की शायरी प्रवान चढ़ी। हज़रत दाग़ फ़न सिपहगरी के इलावा कई ज़बानों पर उबूर रखते थे। 11 साल की उम्र में उन्हों ने हज़रत इबराहीम ज़ोक़ के आगे ज़ानुवए अदब तै किए जिस का नतीजा ये निकला को बहुत जल्द दिल्ली के अदबी हलक़ों में मशहूर होगए। नवाब मुस्तफा ख़ां शेफ़्ता के यहां मुशायरा में पहली बार कमसिन दाग़ ने ग़ज़ल सुनाई। जिसे सुनते ही वहां मौजूद बड़े बड़े शारा-ए-दाद देने पर मजबूर होगए।ख़ास कर इस शेअर पर महफ़िल नारा हाय दाद-ओ-तहसीन से गूंज उठी

शरर-ओ-बर्क़ नहीं शोला-ओ-सीमाब नहीं

किस लिए फिर ये ठहरता दिल बेताब नहीं

दाग़ ने अपनी ज़िंदगी में कई उतार चढ़ाओ देखे, उस वक़्त जब कि वो 26 साल के थे दिल्ली उजड़ गई, बहादुर शाह ज़फ़र क़ैद करके रंगून भेज दिए गए और क़िले में रहने वाले बिखर गए और ख़ास कर दरबार से वाबस्ता शारा-ए-बे यार-ओ-मददगार और ज़रीया मआशसे महरूम होगए। ऐसे में राम पर की छोटी सी रियासत के नवाब यूसुफ़ अली ख़ान ने दाग़को अपने यहां बलालया।

उन्हों ने राम पर मैं 24 साल गुज़ारे लेकिन दाग़ 12 अप्रैल 1888 -ए-को हैदराबाद आए और मुहल्ला सदी अंबर बाज़ार में क़ियाम किया। इस वक़्त दक्कन में निज़ाम साबह मीर महबूब अली ख़ान की हुक्मरानी थी। हैदराबाद में सुकूनत इख़तियार करने के सिलसिले में राजा गिरधारी प्रशाद ने उन की काफ़ी मदद की और उन ही के तवस्सुत से नवाब मीर महबूब अली ख़ान की ख़िदमत में मारूज़ा पेश करते हुए हैदराबाद में मुक़ीम होगए। दाग़ ने सिदी अंबर बाज़ार और अफ़ज़ल गंज के इलाक़ों में 14 साल तक क़ियाम किया बाद में तुरुप बाज़ार में मकान ले लिया। 6 फ़रवरी 1891 -दाग़ के लिए एक अहम दिन साबित हुवा।

जब निज़ाम ने अपनी ग़ज़ल इस्लाह के लिए आप के पास भेजी, यही लम्हा अहम मोड़ साबित हुवा और वो उस दिन से मुल्क उल-शियर ए-ए-बन गए। एक हज़ार रुपय इन का माहाना मुशाहिरा मुक़र्रर हुवा। दाग़ को नाज़िम यार जंग, दुबैर अलद विला और फ़सीह उल-मलिक जैसे ख़ताबात से भी नवाज़ा गया। क़ारईन! कहा जाता है कि शारा-ए-में दाग़ देहलवी के शागिर्दों की तादाद सब से ज़ाइद थी। ख़ुद शायर-ए-मशरिक़ अल्लामा इक़बाल भी आप के शागिर्द थे।

इस से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अल्लामा इक़बाल जैसी अज़ीम शख़्सियत अगर किसी की शागिर्दी इख़तियार करे तो वो कितना अज़ीम होगा। मालूम रहे कि अल्लामा इक़बाल ने जब सारे जहां से अच्छा हिंदूस्तान हमारा जैसी मक़बूल आम नज़म लिखी थी, इस साल यानी 1905 -को हज़रत दाग़ रेहलत फ़र्मा गए।

ऐसा लगता है कि आज हुकूमत और ख़ुद उर्दू दां तबक़े ने हज़रत दाग़ को फ़रामोश कर दिया है। यही वजह है कि उर्दू के इस अज़ीम शायर के मज़ार पर चादर गुल पेश करने वाला भी कोई नहीं। जबकि मुहतरमा लक्ष्मी देवी राज ने कुछ अर्सा क़बल बलदिया हैदराबाद से दरख़ास्त की थी कि यकमीनार मस्जिद से दरगाह हज़रात यूसुफ़ैन(र) जाने वाली सड़क को दाग़ देहलवी रोड से मौसूम किया जाय। मगर इस दरख़ास्त पर कोई तवज्जा नहीं दी गई। ऐसा लगता है कि उर्दू है जिस का नाम हमें जानते हैं दाग़ और हिंदूस्तान में धूम हमारी ज़बान की है जैसा यादगार शेअर तहरीर करने वाले दाग़ ने येशेअर :

ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं

साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

पेश करते हुए उन के साथ इख़तियार किए जाने वाले सुलूक को पेशनगोई करदी थी।

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