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Mazhabi News

हज़रत सिद्दीक़ -ए- अकबर (रज़ी०) का ख्वाब

Sunday, 23 December 2012
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हज़रत सिद्दीक़ अकबर रज़ी० एक बहुत बड़े ताजिर थे। आप तिजारत के सिलसिले में मुल्क ए शाम में तशरीफ़ फ़र्मा थे कि इसी दौरान एक रात आपने ख्वाब में देखा कि चांद और सूरज आसमान से उतर कर इनकी गोद में आ पड़े हैं। हज़रत सिद्दीक़ अकबर रज़ी० ने अपने हाथ से चांद और सूरज को पकड़कर अपने सीने से लगा लिया और उन्हें अपनी चादर के अंदर कर लिया।

सुबह उठे तो एक ईसाई राहिब के पास पहुंचे और इससे अपने ख्वाब की ताबीर दरयाफ्त की। राहिब ने सवाल किया आप कौन हैं? आपने फ़रमाया मेरा नाम अबूबकर है और मैं मक्का का रहने वाला हूँ। राहिब ने पूछा किस क़बीला से आपका ताल्लुक़ है? आपने फ़रमाया बनूहाशिम से। राहिब ने पूछा आपका ज़रीया-ए-मआश क्या है?। आपने फ़रमाया तिजारत।

राहिब ने कहा तो फिर ग़ौर से सुन लो! नबी आख़िर-ऊज़-ज़मा हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम तशरीफ़ ला चुके हैं, इनका ताल्लुक़ भी इसी क़बीला बनी हाशिम से है और वो अल्लाह के आख़िरी नबी हैं। अगर वो ना होते तो ख़ुदावंद क़ुद्दूस ज़मीन-ओ-आसमान को पैदा ना फ़रमाता और किसी नबी को भी पैदा ना फ़रमाता, वो अव्वलीन-ओ-आख़रीन के सरदार हैं।

ऐ अबूबकर! तुम उनके दीन में शामिल हो जाओगे, उनके वज़ीर और उनके बाद अल्लाह के रसूल के ख़लीफ़ा बनोगे। ये है तुम्हारे ख्वाब की ताबीर और ये भी सुन लो कि मैंने इस नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की तारीफ़ और नाअत तौरेत-ओ-इंजील में पढ़ी है और मैं इन पर ईमान ला चुका हूँ और मुसलमान हूँ, लेकिन ईसाईयों के ख़ौफ़ से अपने ईमान का इज़हार नहीं किया।

हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ रज़ी० ने जब अपने ख्वाब की ये ताबीर सुनी तो आप में इश्क़-ए-रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम बेदार हुआ। जब आप मक्का मुकर्रमा पहुंचे तो हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को तलाश करके बारगाह-ए-रिसालत में हाज़िर हुए और दीदार पुर अनवर से अपनी आँखों को ठंडा किया। इस मौक़ा पर हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया ऐ अबूबकर! तुम आ गए हो तो जल्दी करो और दीन-ए-हक़ में दाख़िल हो जाओ।

हज़रत अबूबकर ने अर्ज़ किया बहुत अच्छा, मगर कोई मोजिज़ा देखना चाहता हूँ। हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जो ख्वाब तुम मुल्क ए शाम में देख कर आए हो और उसकी ताबीर जो राहिब से सुन कर आए हो, वो मेरा मोजिज़ा ही तो है।

ये सुनते ही हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ रज़ी० ने फ़रमाया ऐ अल्लाह के रसूल ( स०अ०व०) ! आप ने सच फ़रमाया और मैं गवाही देता हूँ कि वाक़ई आप अल्लाह के सच्चे रसूल ( स०अ०व०) हैं।

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